उत्तराखंड

ब्रेस्ट कैंसर से लड़ाई में सबसे बड़ा हथियार है जागरूकता : डॉ. शशांक जोशी

जागरूकता से बदलेगी ब्रेस्ट कैंसर की तस्वीर, धूम्रपान-मोटापा बढ़ाते हैं खतरा : डॉ. जोशी

रिपोर्ट/नीरज पाल

देहरादून। अक्टूबर का महीना दुनियाभर में ‘पिंक्टोबर’ यानी ब्रेस्ट कैंसर (Breast Cancer) जागरूकता माह के रूप में मनाया जाता है। इसका उद्देश्य महिलाओं को इस बीमारी के प्रति जागरूक करना और समय पर जांच एवं इलाज की महत्ता को रेखांकित करना है।

राजकीय दून मेडिकल कॉलेज के कैंसर विशेषज्ञ डॉ. शशांक जोशी (Dr. Shashank Joshi) के अनुसार, भारत में महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर सबसे आम कैंसरों में से एक है। उन्होंने बताया कि “हर आठ में से एक महिला अपने जीवनकाल में ब्रेस्ट कैंसर से प्रभावित हो सकती है। लेकिन अगर इसका पता शुरुआती अवस्था में लग जाए तो लगभग 90 प्रतिशत मामलों में इलाज संभव है।”

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क्या है ब्रेस्ट कैंसर :- 

डॉ. जोशी ने बताया कि ब्रेस्ट कैंसर (Breast Cancer) तब होता है जब स्तन की कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं और एक ट्यूमर का रूप ले लेती हैं। यह आमतौर पर दूध नलिकाओं या लोब्यूल्स में शुरू होता है और बिना इलाज के शरीर के अन्य भागों में फैल सकता है। इसके शुरुआती लक्षणों में ब्रेस्ट या बगल में गांठ, ब्रेस्ट के आकार में बदलाव, निप्पल से असामान्य डिस्चार्ज और त्वचा पर खिंचाव या दर्द शामिल हैं।

किन कारणों से बढ़ता है खतरा:-

उन्होंने बताया कि सभी महिलाओं में यह बीमारी नहीं होती, लेकिन कुछ जोखिम कारक इसे बढ़ा सकते हैं। इनमें उम्र (50 वर्ष से अधिक), परिवार में कैंसर का इतिहास, जेनेटिक म्यूटेशन (BRCA1/BRCA2), मोटापा, व्यायाम की कमी और शराब का सेवन प्रमुख हैं।

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डॉ. जोशी का कहना है कि “नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, धूम्रपान से परहेज, स्तनपान को बढ़ावा देना और समय-समय पर जांच कराना इस जोखिम को काफी हद तक कम कर सकता है।”

स्क्रीनिंग है सबसे बड़ा हथियार

उन्होंने बताया कि ब्रेस्ट कैंसर की जंग में सबसे प्रभावी हथियार स्क्रीनिंग है। हर महिला को महीने में एक बार ब्रेस्ट सेल्फ एग्जामिनेशन करना चाहिए। 40 वर्ष की उम्र के बाद सालाना मैमोग्राम कराना बेहद जरूरी है। इसके अलावा, जरूरत पड़ने पर क्लिनिकल जांच, अल्ट्रासाउंड या एमआरआई से भी शुरुआती अवस्था में बीमारी का पता लगाया जा सकता है।

डॉ. जोशी ने कहा कि “कैंसर के मरीजों को दवाइयों के साथ भावनात्मक समर्थन की भी उतनी ही जरूरत होती है। परिवार और समाज का सकारात्मक रवैया उनके मनोबल को बढ़ाता है और उपचार के परिणामों को बेहतर बनाता है।”

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जागरूकता से ही बदलेगी तस्वीर

उन्होंने कहा कि देहरादून जैसे शहरों में स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ रही हैं, लेकिन ग्रामीण इलाकों में अब भी जागरूकता की कमी है। “हमें स्कूलों, कार्यस्थलों और सामाजिक मंचों पर महिलाओं को जागरूक करने की पहल करनी होगी। जागरूकता ही मृत्यु दर को कम करने का सबसे प्रभावी माध्यम है।

ब्रेस्ट कैंसर की पहचान और इलाज संभव है, बस जरूरत है समय पर जांच, सही जानकारी और समाज के सहयोग की।
अक्टूबर का यह महीना याद दिलाता है कि “जिंदगी की हर कहानी अहम है, और हर जंग जीतने लायक है।”

— डॉ. शशांक जोशी, कैंसर विशेषज्ञ, राजकीय दून मेडिकल कॉलेज

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