- दांडी यात्रा की अमर गाथा
- जब एक मुट्ठी नमक से हिल गया था ब्रिटिश साम्राज्य
डाॅ. पंकज भारद्वाज -विभूति फीचर्स
12 मार्च 1930 का दिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक स्वर्णिम और प्रेरणादायी अध्याय के रूप में अंकित है। इसी दिन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने ब्रिटिश शासन के अन्यायपूर्ण नमक कानून के विरुद्ध ऐतिहासिक नमक सत्याग्रह का शुभारंभ किया। यह आंदोलन केवल नमक पर लगाए गए कर के विरोध तक सीमित नहीं था, बल्कि यह विदेशी शासन के अन्याय और शोषण के विरुद्ध भारतीय जनमानस की सशक्त और शांतिपूर्ण प्रतिरोध की घोषणा थी।
उस समय अंग्रेज़ी सरकार ने नमक के निर्माण और विक्रय पर अपना पूर्ण अधिकार स्थापित कर रखा था। भारतीयों को अपने ही देश में नमक बनाने की अनुमति नहीं थी और उन्हें महंगे मूल्य पर नमक खरीदने के लिए विवश किया जाता था। नमक जैसी अत्यंत आवश्यक वस्तु पर कर लगाना गरीब और साधारण जनता के लिए भारी कष्ट का कारण बन गया था। इसी अन्याय के विरुद्ध महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए नमक कानून को तोड़ने का निर्णय लिया।
12 मार्च 1930 को गांधीजी ने गुजरात स्थित साबरमती आश्रम से 78 सत्याग्रहियों के साथ लगभग 390 किलोमीटर लंबी ऐतिहासिक पदयात्रा प्रारंभ की। यह यात्रा 24 दिनों तक चली और 6 अप्रैल 1930 को गुजरात के समुद्र तट पर स्थित दांडी पहुँचकर पूर्ण हुई। वहाँ समुद्र तट से नमक उठाकर गांधीजी ने नमक कानून का प्रतीकात्मक उल्लंघन किया। यह एक छोटा-सा कार्य था, किंतु इसके प्रभाव ने पूरे देश में स्वतंत्रता की चेतना को प्रज्वलित कर दिया।
नमक सत्याग्रह ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई गति और व्यापक जनसमर्थन प्रदान किया। देश के कोने-कोने से लाखों लोग इस आंदोलन से जुड़ गए। महिलाओं, किसानों, श्रमिकों और विद्यार्थियों ने भी बड़ी संख्या में भाग लेकर इसे जनांदोलन का रूप दे दिया। हजारों स्वतंत्रता सेनानियों को कारागार में डाला गया और स्वयं महात्मा गांधी को भी गिरफ्तार कर लिया गया, परंतु आंदोलन की ज्वाला और जनसमर्थन निरंतर बढ़ता गया।
इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यह पूर्णतः अहिंसात्मक था। गांधीजी का विश्वास था कि सत्य और अहिंसा की शक्ति से किसी भी अन्यायपूर्ण शासन को चुनौती दी जा सकती है। नमक सत्याग्रह ने न केवल भारत के स्वतंत्रता संघर्ष को नई दिशा दी, बल्कि विश्व का ध्यान भी भारत की आज़ादी की लड़ाई की ओर आकर्षित किया।
आज जब हम 12 मार्च को स्मरण करते हैं, तो यह दिन हमें यह प्रेरणा देता है कि दृढ़ संकल्प, साहस और सत्य के मार्ग पर चलकर बड़े से बड़ा परिवर्तन संभव है। नमक सत्याग्रह केवल इतिहास की एक घटना नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, एकता और जनशक्ति का ऐसा प्रतीक है जिसने भारत की स्वतंत्रता की राह को सुदृढ़ बनाया।
निस्संदेह, एक मुट्ठी नमक से प्रारंभ हुआ यह आंदोलन अंततः उस ब्रिटिश साम्राज्य की नींव को हिला गया, जिसने वर्षों तक भारत पर शासन किया। यह घटना आज भी हमें अन्याय के विरुद्ध शांतिपूर्ण और साहसपूर्ण संघर्ष की प्रेरणा देती है।
