पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ता शहरीकरण, भवन निर्माण में पर्यावरणीय मानकों का पालन जरूरी
देहरादून। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में पर्यटन और चारधाम यात्रा से आवागमन की गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं। इसके चलते राज्य में पर्यावरणीय समस्याएं भी तेज़ी से उभर रही हैं। विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों का कहना है कि अब समय आ गया है जब भवन निर्माण और सड़क निर्माण जैसी गतिविधियों में पर्यावरणीय संतुलन और मानकों का सख्ती से पालन किया जाए।
भारतीय मानक ब्यूरो देहरादून शाखा के निदेशक व प्रमुख सौरभ तिवारी ने चारधाम यात्रा जैसे बड़े धार्मिक आयोजनों में लाखों पर्यटक आते हैं। इस वजह से पर्वतीय क्षेत्रों में होटल और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का निर्माण तेज़ी से हो रहा है। लेकिन अक्सर इन निर्माणों में भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा तय भवन निर्माण संहिता की अनदेखी की जाती है। इस संहिता में मैदानी और पर्वतीय क्षेत्रों के लिए अलग-अलग गाइडलाइंस तय की गई हैं, ताकि विकास कार्यों के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण भी सुनिश्चित हो सके।
जानकारों का कहना है कि भवन निर्माण करते समय ढलानों, जलस्रोतों और हरियाली को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। वहीं, हाईवे और रोडवेज बनाने में भी तकनीक का इस्तेमाल इस तरह होना चाहिए जिससे पहाड़ की स्थिरता और स्थानीय जनजीवन प्रभावित न हो।
पर्यावरणविदों ने अपील की है कि प्रदेश में विकास कार्य तो हों लेकिन यह विकास अंधाधुंध न होकर संतुलित और टिकाऊ होना चाहिए। उनका कहना है कि यदि मानकों का पालन नहीं किया गया तो आने वाले समय में प्राकृतिक आपदाएं और अधिक विनाशकारी साबित हो सकती हैं।



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