बड़ी खबर : हरीश रावत ने क्यों कहा “यादों का सिलसिला” दो घर का पौणा (पाहुना) रहे भूखा

बड़ी खबर : हरीश रावत ने क्यों कहा “यादों का सिलसिला” दो घर का पौणा (पाहुना) रहे भूखा

इंफो उत्तराखंड/ देहरादून

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत हमेशा की तरह मीडिया की सुर्खियां में बने रहते हैं। और हर दिन कुछ न कुछ नया करते रहते हैं। ऐसी ही उन्होंने कल अपने फेसबुक के माध्यम से अपनी पुरानी यादें दोबारा दौराई, जिसमे उन्होंने एक पंक्ति के माध्यम से कहा कि यादों का सिलसिला” दो घर का पौणा (पाहुना) रहे भूखा।

हरीश रावत के अपने शब्दों के विचार 

हरीश रावत ने कहा कि कुछ नया अपनी पदयात्राओं के संस्करण की यात्रा के दौरान दो दिलचस्प घटनाओं को आपके साथ साझा करना चाहता हूं। जब मैं ब्लाक प्रमुख चुना गया, नया-नया जोश था, सौभाग्य से हमको एक BDO भी अपेक्षाकृत एक नौजवान मिल गए। उनमें भी बड़ा जोश था।

 

पहली बार BDO बनकर के आए थे विजय प्रसाद दरमोड़ा। मैंने दरमोड़ा जी से बातचीत कर अपने ब्लॉक में सब जगह पैदल जाकर, कुछ विकास योजनाओं पर बातचीत करने और ब्लॉक को समझने का निर्णय लिया। एक दिन ऐसी ही यात्रा में अपने विकास खंड के महत्वपूर्ण स्थान जालली में रात रहे और वहां से चौनिया होकर नगारझन जाना तय किया। अब तो उसका नाम नागार्जुन है, यह नाम भी मैंने ही सजेस्ट किया था क्योंकि वहां एक शिला के रूप में नागार्जुन देव का मंदिर है, हम नागार्जुन के लिए रवाना हुए। रास्ते में बहुत सारे लोग मिलते गये, यात्रा में हमारे दो स्थाई भाव श्री शिव सिंह जी और शंभू सिंह जी हमारे साथ थे, दोनों चाचा भतीजे थे और लोग मजाक में उन्हें शंभू-निशंभू भी कह देते थे।

 

 

दोनों कांग्रेसी मिजाज के कपड़े पहनने वाले, सफेद टोपी धारी थे, झोला लेकर के चल पड़ते थे। शंभू सिंह जी ज्येष्ठ ब्लाक प्रमुख भी थे। शिव सिंह जी मुनिया चौरा के ग्राम प्रधान थे और सारे इलाके की जानकारियां उनकी उंगलियों में थी। दोनों लोग अच्छी खासी, हम लोगों को जानकारियां देते हुए रास्ते को बड़ा सरल बना देते थे। खैर रास्ते के गांव में भी बड़ा स्वागत हुआ। डहल पडयूला में पानी बहुत आता है। वहां केले के झुरमुट भी बहुत थे, दूसरे बृफ भी बहुत थे।

 

 

गाँव वाले प्याज थोड़ा-थोड़ा लगाते थे, मैंने और बीडीओ साहब ने लोगों से बातचीत की। हमने वहां के लिए प्याज की पौध की व्यवस्था भी करवाई। उस समय प्याज की पौध को लगाने का मौसम था और हमने गांव के प्रत्येक आदमी को प्याज की पौध दिलवाई। अच्छा खासा प्याज वहां पैदा हुआ। उसके बाद वह क्षेत्र प्याज उत्पादकीय क्षेत्र हो गया। डहल पडयूला के लोग बाद में भी जब मैं ब्लाक प्रमुख नहीं था, मिलते थे, और कहते थे साहब आप हमारे गांव को प्याज और सब्जियों की बड़ी सौगात देकर की गये थे।

 

 

ब्लॉक में उस समय ग्रांट बहुत कम आती थी, थोड़ी बहुत जितनी ग्रांट आई उससे हमने गुलें बनाकर, छोटी-छोटी डिग्गियां अलग-अलग जगहों पर बनवाई, ताकि बड़ी संख्या में सब्जी उत्पादन का काम हो सके और बाद में वहां लोगों ने धान की पौध लगाना भी प्रारंभ किया। एक प्रकार दोनों गांव, कृषि प्रधान गांव हो गए। मूलतः वह गांव ब्राह्मणों के थे, इसलिए ज्यादातर लोग वृति पर आधारित लोग थे, खेती को उन्होंने अच्छे व्यवसाय के रूप में पकड़ लिया। वह हमारी यात्रा की एक बड़ी उपलब्धि रही। हमारे साथ जालली के ग्राम प्रधान गंगा सिंह जी, तकल्टी के प्रधान पदम सिंह जी व चौनिया के प्रधान जी, शिव दत्त जी सहित अन्य लोग थे।

 

उधर नागार्जुन से भी कुछ लोग हमको लेने आ गए थे, खैर 4 बजे के करीब हम नागार्जुन पहुंचे और गांव वालों ने अच्छे ढोल-नगाड़ों के साथ भव्य स्वागत किया। मोटी चटाईयां, जिनको फीणे कहते थे, बल्कि कुछ को मातिरा भी कहते हैं। गेहूं के डंठलों और मालू के रेशों से लोग गांव में खुद ही बनाते थे। उसी में फसल आदि भी सुखाते थे और गांव में कोई मेहमान आ जाए तो बिछाने और सोने के काम आते थे, तो वह बिछाए हुए थे। अच्छी खासी बातचीत प्रारंभ हुई, फिर गांव वालों ने पहले चाय व बिस्कुट खिलाये।

 

 

फिर चाय- बिस्कुट के बाद बातचीत चलती रही और 1 घंटे के बाद थोड़ा-थोड़ा अंधेरा भी होने लग गया तो बहुत सारा हलुवा अलग अलग थालियों में लगा करके खूब आलू, दूध से भरे हुए गिलास आए, दही भी आई। मैं भी उस समय नया-नया था। थोड़ा यह भी संकोच करता था कि यदि मैं बहुत खाऊंगा तो लोग कहेंगे कि हमारे ब्लाक प्रमुख तो बहुत पेटुआ है। मगर बहुत भूख लगी थी कुछ हलुवा खाया, कुछ आलू के गुटके खाए, एक गिलास दूध भी पिया और बल्कि दही भी खाया। बीडीओ साहब ने मेरी देखा-देखी खाया और कम-२ खाया।

 

मगर अन्य लोगों ने भी खूब खाया। गांव जंगल के नजदीक था इसलिए वहां दूध-दही अच्छा होता था। हमारे साथी शंभू सिंह जी, शिव सिंह जी, शिवदत्त जी, लोगों ने अपना-अपना भाषण देकर खूब खाया। हमने सोचा कि मौके का फायदा उठाकर ये हलवे के साथ घी, आलू, दही-दूध खा रहे हैं। उस समय तक हमको यह मालूम नहीं था कि यहां पूरा खाना है और न किसी ने हमसे कहा। इसलिये मैंने और BDO साहब ने थोड़ा-थोड़ा खाया। खाने के साथ मीटिंग पूरी हो गई। गांव वाले भी सब चले गए। हमको एक कमरे में भेज दिया गया, वहां हमारे रहने की व्यवस्था थी। दो खटिया लगी थी और हमको कमरे में पहुंचते-पहुंचते अंधेरा हो गया था।

 

उस समय, उस क्षेत्र में बिजली नहीं थी, सड़क भी नहीं थीं। दीवाल गिरी जला दी गई। उसके आलोक में हम बैठकर आपस में गपशप करने लगे। कुछ लोग आए, उनसे भी बातचीत करके वो भी सब चले गए और जो हमारे साथी थे, वह भी अपनी रात्रि इंतजार में चले गएगए। हम इंतजार करने लगे कि खाने के लिए हमको कोई बुलाएगा। खाना खा लो कहने के लिए कोई आया ही नहीं। हम लोगों ने बाहर आकर खांसा-खकारा ताकि लोग आवाज सुनकर कहे कि खाना खा लो। फिर हमने देखा कि धीरे-धीरे सब लोगों के दरवाजे बंद होते जा रहे हैं।

 

एक घर से उजाला आ रहा था, वहां तक हमको आशा थी कि खाना मिलेगा, जब उस घर से भी खाना नहीं आया और उन्होंने भी बत्ती बुझा दी। हमने आपस में बातचीत की, कहा कि खाने का क्या होगा यह तो कोई पूछ ही नहीं रहा है। BDO साहब ने कहा कोई आ रहा होगा, किसी के वहां खाना बन रहा होगा आ जाएगा, गांव में ऐसा ही होता है। खाना दूर किसी घर से बनकर आएगा, हम दोनों खाने का बहुत देर तक इंतजार करते रहे। जब रे गांव में अंधेरा हो गया, कहीं कोई हलचल नहीं तो हम समझ गए आज तो गड़बड़ हो गई।

 

खैर हमने यह मान लिया कि खाना नहीं आएगा। हमने आपस में बातचीत की कि खाना नहीं आया, क्योंकि खाना वही था जो उन्होंने उस समय खिलाया था, हम चूक गए और इसीलिए हमारे साथी लोगों ने खूब जमकर के खाया और हम रह गए। हम में से शंभू सिंह जी, गंगा सिंह जी, शिव सिंह जी इनको खूब कोसा और सो गए। जैसे तैसे नींद आ ही गई, लेकिन सुबह जल्दी आंख खुल गई। कमरे में पानी रखा हुआ था, लोटे रखे थे। हमने लोटे पकड़े और दिशा शौच को निकल गए, काफी दूर गये। वहां से आकर के ब्रश किया, तब तक कुछ और लोग जाग गए थे, हमने कुछ और पानी मांगा, पंच स्नान किया। मैं और दरमोड़ा जी बिना स्नान के खाने वालों में नहीं थे। मैंने, बी.डी.ओ. साहब से कहा कि भई जल्दी-जल्दी स्नान कर लो। अब जो कुछ पहले आएगा खाने को उस पर ही टूट पड़ना है। हम तो रात के भूखे थे।

 

खैर समय पर रोटियां, सब्जी, हलुवा, पूरी, घी सब कुछ आया तो फिर हमने आंख बंद करके जमकर के सब कुछ खाया। वहां से हमें नौबाड़ा जाना था। शिव सिंह जी आदि ने कहा कि उत्तमछानी इंटर कॉलेज में आपके खाने का पूरा इंतजाम है, हमने उनको धन्यवाद दिया और हमने कहा कि कल की तरह से गलती नहीं करनी है, अभी जो मिल रहा है, उसको खा लेना है। हमने जमकर के खाया, फिर नागार्जुन से विदा हो गए।

 

आज नागार्जुन में हाई स्कूल है, सड़क भी पहुंच गई है और द्वाराहाट व भिकियासैंण का केंद्र भी है और बड़ा सुंदर स्थल है। यह घटना गांव का उत्साह पूर्ण स्वागत और अपनी वह चूक हमेशा याद रहती है। हम अपनी ब्लॉक को समझो यात्रा के इस महत्वपूर्ण दिन को नहीं भूल सके। कभी-कभी मैं और दरमोड़ा साहब जब कभी दूसरी जगह भी जाते थे तो उस दिन का जिक्र करके खूब हंसते थे। आज भी आप सबसे उस रात का जिक्र करते हुए मेरे चेहरे पर खिसियानी मुस्कुराहट है। उस रात को मुस्कुराहट नहीं आई थी क्योंकि भूख लगी हुई थी, भूखा सोना पड़ा था। लेकिन सुबह जब खाना आदि सब मिल गया था तो वहां हमारे लिए एक हंसी लाने वाली घटना बन गई थी।

 

स्व. गोविंद सिंह महरा रानीखेत क्षेत्र के विधायक थे। मैं भिकियासैंण ब्लॉक का प्रमुख था। उनके साथ एक यात्रा में स्याल्दे से पैदल सराईखेत को चले। अगासपुर में बेलवाल जी के घर खाना खाया, सराईखेत के नेता घनश्याम दत्त मंमगाई साथ थे, उसी एरिया के नेता थे। वहीं एरिया के हमारे नेता थे। सालिग्राम नौटियाल जी और अन्य दूसरे लोग भी विधायक जी के स्वागत के लिए आए थे। चनौली कृषि हाईस्कूल में हमारा स्वागत हुआ। पूरे अल्मोड़ा में कृषि विषय की मान्यता वाला एकमात्र हाईस्कूल था। रात हमें सराईखेत में रहना था।

 

 

सराईखेत में मान्यता प्राप्त इंटर कॉलेज था । हम घनश्याम मंमगाई जी के मेहमान थे, उन्होंने एक गांव में चाय पिलाई और घनश्याम जी तो हमको चाय पिलाने के बाद कॉलेज ले गए। खूब स्वागत, भाषण हुए। फिर मंमगाई जी विधायक जी को प्रिंसिपल जी के कमरे तक छोड़ गए। प्रिंसिपल्स साहब, अध्यापकगण सब बातचीत करते रहे। घनश्याम जी का गांव वहां से दो-ढाई किलोमीटर दूर था। शाम को वो अपने गांव निकल गए। प्रधानाचार्य जी ने समझा कि हम घनश्याम दत्त जी के मेहमान हैं और जिस घर में वह पहले लेकर के गए थे, शायद हमने वहां खाना खा लिया होगा और प्रिंसिपल साहब ने डटकर के बातचीत भी की, चाय भी पिलाई और जब अध्यापकगण जाने लग गए।

 

 

प्रिंसिपल साहब हुक्केबाज थे। वह नारियल वाला हुक्का पीते थे, जब उनका हुक्का शांत हो गया, तो उसको नीचे रखा और अपने चौकीदार से कहा कि विधायक जी को उस कमरे में सुला देना, वहां बंदोबस्त कर रखा है, वहां तीन खटिया हैं और हाथ जोड़ दिए। मैंने विधायक की तरफ देखा, एक हमारे लोकल व्यक्ति थे, उनकी तरफ देखा, कुछ समझ में नहीं आया। खाने का क्या होगा! प्रिंसिपल साहब बाहर तक छोड़ने आए। उनके निकलने के बाद विधायक जी ने कहा खाने का क्या इंतजाम है, तो चपरासी जी ने बताया कि खाने का तो किसी ने हमको बताया नहीं, हमने कहा अब क्या होगा! चौकीदार ने कहा चलिए साहब बाजार में देखते हैं, वहां एक होटल वाला है। सराईखेत सड़क का अंतिम पड़ाव था उधर गढ़वाल पड़ता था और इधर कुमाऊं था।

 

 

गांव का सामान आदि सब यहीं मिलता था, क्योंकि वही पर तक बस आती थी। कुछ लोग वहां रात रुक भी जाते थे। होटल कम ढाबा जो भी कह लीजिए वो था, हम वहां गए तो उसने भी हाथ खड़े कर दिए। लेकिन बड़ी मुश्किल से उसने कहा कि थोड़ी सी सब्जी बची हुई है और कुछ रोटियां हैं। हमारा नौकर तो सो गया है, बहरहाल मैं आपके लिए चाय बना देता हूं कुछ बंद, बिस्कुट हैं वो खा लीजिए। खैर हमने बंद, बिस्कुट जो रोटी-सब्जी बची हुई थी, उससे काम चलाया। प्रधानाचार्य जी व मंमगाई जी की जै करते हुए उनकी बताई गई जगह पर सोने के लिए चल दिए। विधायक जी ने हम सब लोगों से कहा कि 2 गांव का पाहुना भूखा रहता है। चलो आज आधे पेट ही सही।

 

हम दो घर के पाहुने थे, जो होस्ट था हमको छोड़ कर के वह तो गांव चले गए और उन्होंने सोचा प्रिंसिपल खिलाएगा और प्रिंसिपल ने सोचा कि उन्हें खाली सोने का बंदोबस्त करना है, यह तो भला हो उस चौकीदार का, उसने हमको वह होटल बता दिया और होटल वाले ने भी जैसे-तैसे कुछ खिला ही दिया, नहीं तो इतना पैदल चलकर के आए थे भूख से हालत खराब हो जाते। हम उस दिन से दो घर के पौणे वाली यात्राओं में बड़ा सावधान रहते थे पहले से ही सुनिश्चित कर लेते थे की रात का खाना कहां मिलेगा क्योंकि जब पदयात्रा में जाते थे तो खाना सुनिश्चित करना यह बहुत आवश्यक था, मगर आज भी वह दो घर के पौणां रह जाए भूखा कहावत मुझको बार-बार याद आती है।

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