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उत्तराखंड : सांस्कृतिक पहचान बचाने के लिए हुआ “पहाड़ी स्वाभिमान सेना” का गठन,…. पहाड़ के इन सवालों पर होगा अब जमीनी- संघर्ष, पढ़ें…

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खत्म नहीं होने देंगे हम अपनी सांस्कृतिक पहचान

उत्तर-प्रदेश से अलग होने के लिए उत्तराखंड के लोगों ने अपनी शहादतें दी, लाठी-गोलियां खाई, महिलाओं ने दुराचार झेला। तब जाकर हमें अपना राज्य मिला।

राज्य निर्माण की मूल अवधारणा यही थी कि उत्तराखंड की अपनी सांस्कृतिक पहचान बची रहे। विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले पर्वतीय क्षेत्र का विकास हो। लेकिन आज हमारे प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान खतरे में है। आज उत्तराखंड की डेमोग्राफी (जनसांख्यकीय) में बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है।

मोहित डिमरी ने बताया कि पिछले बीस वर्षों में बाहर से तकरीबन 40 लाख लोग यहां आ गए हैं। यह संख्या तेजी से बढ़ रही थी। इसी तेजी से बाहरी लोगों की जनसंख्या बढ़ती रहे तो वह दिन दूर नहीं होगा जब मूल उत्तराखंडी अल्पसंख्यक हो जायेंगे और हमारी सांस्कृतिक अखंडता खत्म हो जायेगी। जिस सांस्कृतिक पहचान के लिए हमारे लोगों ने राज्य बनाया, वहीं आज खतरे में है। यह सब राष्ट्रीय पार्टियों की सोची-समझी साजिश के तहत हो रहा है।

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उन्होंने कहा कि 1950 से जो भी व्यक्ति (चाहे वह किसी भी धर्म-जाति का है) उत्तराखंड की सीमा में रह रहा है, वह यहां का मूल निवासी है। सरकार को मूल निवासियों के लिए नौकरियों में प्राथमिकता और अन्य सुविधाएं देनी चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि कुछ वर्ष पूर्व उत्तराखंड में बसे लोगों को सभी तरह की सुविधाएं दी जाय। ऐसे लोग अपने मूल प्रदेश में भी लाभ ले रहे हैं और उत्तराखंड में भी उन्हें सरकारी लाभ मिल रहा है।

उन्होंने आगे कहा कि अगर बाहरी राज्यों के लोगों को हमारे संसाधन दिए जाते हैं, तो यहां के लोग कहाँ जायेंगे ? हम चाहते हैं कि मूल निवासियों को राज्य के अधीन होने वाली राज्य लोक सेवा आयोग, अधीनस्थ चयन सेवा आयोग या अन्य आउटसोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से आयोजित भर्ती में वरीयता दी जानी चाहिए। प्राइवेट सेक्टर में 80 प्रतिशत रोजगार मूल निवासियों को मिलना चाहिए। बाकी बीस प्रतिशत रोजगार अन्य प्रदेशों के लोगों को दिया जाय।

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मोहित डिमरी ने कहा कि कुछ लोग पहाड़-मैदान के नजरिए से देख रहे हैं। जबकि मैदान में रह रहे मूल निवासी मेरी इस बात का समर्थन कर रहे हैं। मैदानी क्षेत्र के मूल निवासी समझ रहे हैं कि जो लाभ उन्हें मिलना था, वह कुछ साल पहले बाहर से आये लोगों को मिल रहा है।

मूल निवास 1950 के समर्थन में मैदान और पहाड़ के लोग एकमत हैं। मूल निवास 1950 न होने की जो पीड़ा पहाड़ की है, वही मैदान की भी है। इसमें कुछ के तत्व फूट डालने का काम कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि कुछ साथियों का यह भी सवाल था कि उत्तराखंड के लोग बाहर नौकरी करते हैं। उन पर भी आपकी इस सोच का असर पड़ सकता है। हमें यह समझना होगा कि उत्तराखण्ड के अधिकतर लोग प्राइवेट सेक्टर में काम करते हैं।

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उत्तराखंड में भी प्राइवेट सेक्टर में बीस प्रतिशत अन्य प्रदेशों के लोगों को नौकरी देने की हम बात कर रहे हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए कि एक राज्य के पाँच सौ लोगों को एम्स जैसे संस्थान में नौकरी दी जाय और हमारे यहाँ के लोगों को बाहर किया जाय। इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है।

डिमरी ने कहा कि उत्तराखंड के मूल निवासियों के हक की लड़ाई लड़ते रहेंगे। अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाने के लिए संघर्ष करते रहेंगे। पर्वतीय राज्य की परिकल्पना को खत्म नहीं होने देंगे। मैं उत्तराखंड के मूल निवासियों से अपील करना चाहता हूँ कि छपने हक़ के लिए इस लड़ाई को लड़िए और अपना भविष्य सुरक्षित कीजिये।

(मोहित डिमरी)

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