मानवीय चूकों का परिणाम भीषण हादसे, हादसों में मौतों का जिम्मेदार कौन ? पढ़िए पूरी खबर
हादसा चाहे कोई सा भी हो मानवीय चूकों का परिणाम होता है। सड़क, रेल, आग्निकांड जैसे हादसों के बारे में आए दिन खबरें पढ़ने-सुनने व देखने को मिलती ही रहती हैं। प्रतिवर्ष अनगिनत लोग विभिन्न प्रकार के हादसों में अपनी जान गवां बैठते हैं।
मनुष्य का स्वभाव ऐसा है, कि अपनी गलती होते हुए भी स्वीकारता नहीं। दोष भगवान पर थोप दिया जाता है। बार-बार उन गलतियों को दोहराता रहता है। गलतियों से सबक लेने को तो मनुष्य शायद महापाप मानता है। उसकी थोड़ी-सी चूक चाहे कितनी जानें लील ले उसे किसी प्रकार का पश्चाताप नहीं होता। पछतावा तब होता है जब किसी प्रकार का भीषण हादसा उसके व उसके अपनों के साथ घटित हो जाए।
किसी भी हादसे का उदाहरण ले लें। जैसाकि ताजा हादसा ओड़िशा के बालासौर रेल दुर्घटना पर ही नजर डालें तो दो यात्री और एक मालगाडी के पटरी से उतर जाने के कारण कई लोग घायल हो गए, और 250 से अधिक मौत के मुंह में समा गए।
यह पहला हादसा नहीं बल्कि अन्य भी खतरनाक हादसे हुए हैं। 1981 में बिहार में ट्रेन नदी में जा गिरी थी। जिसमें लगभग 800 लोगों की मौत हुई थी। 1995 में पश्चिम बंगाल में ब्रह्मपुत्र मेल व अवध-असम मेल आपस में टकराई जिसमें 285 यात्रियों की मौत हुई।
1995 में फिरोजाबाद में दो यात्री रेलों की टक्कर हुई जो 250 यात्रियों की जिंदगी ले बैठी। 2010 में पश्चिम बंगाल में ज्ञानेश्वरी एक्सप्रैस पटरी से उतरी थी। जिसमें 170 यात्री अपनी जान से हाथ धो बैठे। 2016 में इंदौर-पटना एक्सप्रैस की चौदह बोगी पटरी से उतरी थी जिसमें लगभग 125 यात्री मौत के मुंह में समा गए थे।
इसके अलावा अन्य भी दुर्घटनाएं घटी। इसी प्रकार से देश में जितनी सड़कों का विस्तारीकरण व नौडीकरण हो रहा है। सड़क हादसे उतने ही अधिक घट रहे हैं। आखिर कमी तो इंसान के अंदर ही है, जो अपने कार्य और कर्तव्य के प्रति समर्पित नहीं रहता।
हरेक यही सोचता है, कि मैं तो जिंदा हूं दूसरों से क्या लेना-देना। जब तक यह भावना मन में रहेगी तब तक इंसान कोई न कोई चूक करता ही रहेगा। जबकि, मनुष्य को दूसरों की जान लेने का कोई हक नहीं है। यदि मनुष्य अपनी छोटी-छोटी भूलों की तरफ ध्यान दे तो बड़ी भूलें होंगी ही नहीं।
रिपोर्ट- ओम प्रकाश उनियाल
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