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बदलाव : लैंसडाउन का नाम बदलने से नहीं बदलेगी पहाड़ की तस्वीर, पहले कालौं डांडा तो अब जसवंतगढ़ करने का प्रस्ताव..

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लैंसडाउन का नाम बदलने से नहीं बदलेगी पहाड़ की तस्वीर, पहले कालौं डांडा तो अब जसवंतगढ़ करने का प्रस्ताव

लैंसडाउन/ इंफो उत्तराखंड 

कोटद्वार से दुगड्डा मोड तक दिल्ली, हरियाणा और पंजाब की कारों की बहुत आवा-जाही थी। लैंसडाउन मोड के बाद वाहनों का शोर कम हो गया और फिर पूरे रास्ते कुछ निजी कारों को छोड़कर गढ़वाल की लाइफ लाइन जिन्हें मैं मौत की सवारी कहता हूं, मैक्स दौड़ती रही।

लैंसडाउन में इन दिनों सैलानियों का जमावड़ा है। सरकार अपनी पीठ ठोक सकती है कि लैंसडाउन के होटल, रिजार्ट और कैंपर हट्स सब फुल हैं। हालांकि 90 प्रतिशत से अधिक होटल और व्यवसाय पर बाहरी लोगों का ही कब्जा है।

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इसके बावजूद हम खुश हो सकते हैं कि पहाड़ियों का भी काम मिल रहा है। जो लोग पुरोला मामले पर मुट्ठियां ताने हुए हैं, वो लोग लैंसडाउन पर जरूर नजर रखे। जब ऑफ सीजन होता है तो वहां के होटलों में क्या गुल खिलते हैं। इसका हिसाब-किताब जरूर रखें।

सरकार को कुछ कुलबुला रहा है। नाम बदलने से तकदीर बदलती है क्या?

लैंसडाउन स्थापित टूरिस्ट प्लेस बन गया है। इसको कालो-डांडा और अब जसवंतगढ़। कैंट बोर्ड में प्रस्ताव पास कर रक्षा मंत्रालय को भेजा जा चुका है। नाम भी बदल जाएगा। लेकिन क्या वहां देश के रणबांकुरे महावीर चक्र विजेता राइफलमैन बाबा जसंवत सिंह के नाम पर रख देने से क्या पहाड़ के हालात बदल जाएंगे। वाइब्रेंट विलेज माणा या गुंजी के लिए क्या योजना बनी? कितने प्रवासियों से रिवर्स माइग्रेशन पर बात हुई? यह डिटेल रिपोर्ट अलग से दूंगा।

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लेकिन मेरा यह कहना है कि लैंसडाउन का नाम बदलने की बजाए, सरकार पौड़ी के कुछ अन्य टूरिस्ट डेस्टिनेशन को क्यों नहीं तलाशती। ताड़केश्वर, ज्वाल्पा-दीबा देवी मंदिर धार्मिक पर्यटन सर्किट में शामिल किये जाएं। चौंदकोट में ग्रामीणों द्वारा निर्मित 51 किलोमीटर लंबे जनशक्ति मार्ग को क्यों नहीं टूरिस्ट मैप में दिखाया जाता कि जनता चाहे तो पहाड़ की तस्वीर और तकदीर बदल दें।

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वीरांगना तीलू-रौतेली के गांव गुराड़ और चौंदकोट गढ़ी को क्यों नहीं पर्यटन से जोड़ा जाता। हमारी संस्कृति और विरासत को भी महत्व मिलेगा। यहां गुरुद्वारा श्री रीठा साहिब भी है और इसे भी हेमकुंड साहिब की तर्ज पर प्रचारित कर टूरिस्ट इस वीरान हो रहे पहाड़ की ओर मोड़े जा सकते हैं ताकि जो कुछ गांव में बचे हुए लोग हैं, उनकी रोजी-रोटी तो चल सके। वरना सरकार रोजगार के नाम पर पांच किलो गेहूं-चावल देकर ही समझ रही है कि पहाड़ बचा लेंगे।

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