उत्तराखंड

खामोश हुए घराट, लुप्त हो रही पारंपरिक पहचान

  • घराट: पहाड़ की धरोहर अब विलुप्ति की कगार पर ।

मदन पैन्यूली/ उत्तरकाशी 

पहाड़ की पारंपरिक जीवनशैली और लोकसंस्कृति का अहम हिस्सा रहे घराट (पानी से चलने वाले आटा चक्की) अब धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में सिमटते जा रहे हैं। कभी गांवों में अनाज पिसाने का प्रमुख साधन रहे घराट आज सुनसान गदेरों और वीरान पगडंडियों के बीच खामोश खड़े हैं।
पहाड़ी क्षेत्रों में बहने वाली छोटी जलधाराएं, जिन्हें स्थानीय भाषा में गदेरे कहा जाता है, घराटों की जीवनरेखा हुआ करती थीं। इन्हीं गदेरों के किनारे लकड़ी और पत्थरों से बने घराटों में पानी की धार से चक्की चलती थी, जहां ग्रामीण गेहूं, मडुवा, झंगोरा और मक्का जैसे अनाज पिसवाते थे।

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ग्रामीणों के अनुसार, एक समय ऐसा था जब घराट केवल पिसाई का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक मेल-मिलाप का केंद्र भी हुआ करते थे। लोग यहां इकट्ठा होकर गांव-समाज की बातें करते, लोककथाएं सुनाते और आपसी संबंधों को मजबूत करते थे।

हालांकि, बदलते समय और आधुनिक तकनीक के प्रभाव से घराटों का महत्व लगातार घटता गया। गांवों में बिजली से चलने वाली चक्कियों की उपलब्धता और बाजार में पैक आटे के बढ़ते प्रचलन ने घराटों को पीछे छोड़ दिया। इसके साथ ही, पहाड़ों से बढ़ते पलायन ने भी इनकी उपयोगिता को काफी हद तक प्रभावित किया है।

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स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि कुछ दशक पहले तक लगभग हर गांव या उसके आसपास एक-दो घराट जरूर होते थे, जिनसे कई परिवारों की आजीविका चलती थी। लेकिन आज अधिकांश घराट या तो जर्जर हो चुके हैं या पूरी तरह बंद हो गए हैं।

पर्यावरण और लोकसंस्कृति से जुड़े जानकारों का मानना है कि घराट केवल पारंपरिक तकनीक ही नहीं, बल्कि जल संरक्षण और प्रकृति के अनुकूल जीवनशैली का भी सशक्त उदाहरण हैं। यदि इनका संरक्षण किया जाए, तो इन्हें ग्रामीण पर्यटन और पारंपरिक ज्ञान के अध्ययन केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है।

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विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार और समाज के संयुक्त प्रयासों से इस विलुप्त होती धरोहर को बचाया जा सकता है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी पहाड़ की इस अनूठी परंपरा से परिचित हो सकें।

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